Thursday, May 06, 2010

मधेसियों की एक तरफ  व्यथा और उन की दुर्दशा 
अपने नेतायों की अनगिनत स्वार्थलोलुप अभिलाषा 


हालत पानी बिन मछली सी, तड़प का न ही कोई अंत हैं 
अँधेरे रास्तें , अदृश्य लक्ष्य , समस्याएं अनंत हैं 


अंतर्कलह , आपसी रंजिश एकता में बाधक हैं बना
क्या मधेसी धरती ने एक भी पुत्र ऐसा न जना ?


विचार जिस का अडिग हो , रास्तें चाहे जितना भी कठिन हो 
एक सूत्र में सब को बांध के चलने वाला वोह पथिक हो 


आज भी कितना विचलित हैं युवा हमारे , जो कर्णधार हैं कल्ह के  
जात-जाती और भाषायों के ग़दर से जो आये वोह निकल के 


सुगम होगा रास्ता कितना , मंजिल होगी हमारे डगर पे 
विलम्ब न करे अब हम , आज से ही लग जाते हैं समर पे 


एकता की जरूरत हैं आज , हमारे उत्थान के लिए 
मानवता को शेष रख , आहूती देना होगा मिटटी के लिए


एक निश्चय तो करना ही होगा, साथ रहने का जबतक मंजिल न मिले 
अग्रसर होना ही होगा प्रगति पथ पर अविचलित और बिना हिले 


आज के युवायों से बस एक ही गुज़ारिश हैं मेरी 
भटके अबतक बड़ी , न करो कोई अब देरी 


हाथ से  हाथ हम मिलाते हैं, जाना हैं बड़ी दूर अभी  
होंगे हम कामयाब एकदिन , फिर सच होंगे सपने सभी 







1 comments:

Amritbir Kaur said...

A nice poem..with a beautiful and an equally meaningful message for the greed-driven youth of today. We all need to unite..we need to act as one unified force to fight the evils that have cropped up in our society.
Good work.keep it up!