Wednesday, July 13, 2011

मैं जाने क्यू ऐतबार करता रहा अबतक ?
सोचा ही नहीं कहानी कुछ और ही हैं 
मैं करता रहा हूँ इंतज़ार तुम्हारी अबतक 
पर तुम्हारी मंजिल शायद कही और ही हैं ?

2 comments:

Sandeep Kumar said...

छुप कर बैठी हो कहाँ अबतक

गुज़र गए साल तेरे इंतज़ार में

चुप रहूँगा आखिर मैं कबतक

मर गए जज़्बात तेरे इंतज़ार में

Sujit Thakur said...

Sandeep, mind blowing , it's true, there is a limit of everything , superb line that last one...keep it up!