तुम्हारी ममता के छाव में पला हूँ अबतक
पर मैंने दुःख दर्द के सिवा दिया न कुछ अबतक
मेरी हर जिद्द , मेरे हर हठ को मानती रही हो
मुझ को खिलाने को कई बार भूखी भी रही हो
बचपन से आजतक जब भी मैं उदास हुआ
तुम्हारे आँचल के छाव में संतुष्टि का एहसास हुआ
तुम्हारी इस निश्छल प्रेम का न कोई जोड़ हैं
तुम याद न आई ऐसा जीवन में न कोई मोड़ हैं
तुम्हारे आशीर्वाद के कबच ने बचाया हैं अबतक
पूजता रहूँगा मैं तुम को सांसे चलेंगी जबतक
शिशिर ऋतू के ठंढ में जीवन देनेवाली धुप हो
माँ तुम ईश्वर का जीता जागता एक रूप हो
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