Friday, August 05, 2011

अपनी  वेदना  किस  से  कहू  मैं 
पीड़ा   भयंकर  कैसे  सहू मैं 
सिने  में  ज़ख्म  चाहे  तू  दे  दे 
मेरे  आँखों  को  आंशु से  भिगो  दे 
हर  चोट   को  सह  लू  मैं 
तुम्हारे  प्रेम  के  बिना  भी  रह  लू  मैं 
पर  मेरी  ममता  का  यु  न  खिलवाड़  करो 
छोटी छोटी  बातों पर  न यु  तकरार  करो 
लहू  चाहे  बहे  किसी  का 
गोली  खाए  सीना  किसी  का 
रोयेगा  दिल  इस  माँ  का 
तडपेगा   दिल  इस  माँ  का 
माना की  गर्भ   में  न  पाला है  मैंने  किसी  को 
पर  अन्न  का   दाना  और  पानी  दिया  है सभीको 
मेरे  लिए  तो  सब  एक  सामान  है 
मानो या  न  मनो  सब  मेरे ही  संतान  है 
तुम  ने  है  खिची  लकीरें  यहाँ 
बांटा   है  खुद  को  तुम ने  यहाँ 
कभी  देश  के  नाम  में 
कभी  प्रदेश  के  नाम  में 
कभी  जात-जाती   में  तुम  बटें  हो 
कभी  धर्मो  में  भी  तुम बटें  हो 
फर्क  जब  ऊपर  वालें   ने  न किया  हो 
न  जाने  क्यों  तुम  अबतक  लड़ते   रहे  हो 




1 comments:

Anonymous said...

चढा है तुमको जब प्यारका बुखार
मिलेगा तुमको सबकुछ उधार
वेदना हो या पिडा, चोट हो या तकरार
सिनेका ज़ख्म ओैर आँखोंका आंशु
बस कर अब क्या क्या लेगा उधार

तेरे लिए तो सब एक 'सामान' है
हाँ ईस सामान से तो सिर्फ
तु हि कर सकता है प्यार

Carry on brother......Very nice going...

Jay