अपनी वेदना किस से कहू मैं
पीड़ा भयंकर कैसे सहू मैं
सिने में ज़ख्म चाहे तू दे दे
मेरे आँखों को आंशु से भिगो दे
हर चोट को सह लू मैं
तुम्हारे प्रेम के बिना भी रह लू मैं
पर मेरी ममता का यु न खिलवाड़ करो
छोटी छोटी बातों पर न यु तकरार करो
लहू चाहे बहे किसी का
गोली खाए सीना किसी का
रोयेगा दिल इस माँ का
तडपेगा दिल इस माँ का
माना की गर्भ में न पाला है मैंने किसी को
पर अन्न का दाना और पानी दिया है सभीको
मेरे लिए तो सब एक सामान है
मानो या न मनो सब मेरे ही संतान है
तुम ने है खिची लकीरें यहाँ
बांटा है खुद को तुम ने यहाँ
कभी देश के नाम में
कभी प्रदेश के नाम में
कभी जात-जाती में तुम बटें हो
कभी धर्मो में भी तुम बटें हो
फर्क जब ऊपर वालें ने न किया हो
न जाने क्यों तुम अबतक लड़ते रहे हो
1 comments:
चढा है तुमको जब प्यारका बुखार
मिलेगा तुमको सबकुछ उधार
वेदना हो या पिडा, चोट हो या तकरार
सिनेका ज़ख्म ओैर आँखोंका आंशु
बस कर अब क्या क्या लेगा उधार
तेरे लिए तो सब एक 'सामान' है
हाँ ईस सामान से तो सिर्फ
तु हि कर सकता है प्यार
Carry on brother......Very nice going...
Jay
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