Wednesday, October 26, 2011

हमारी सरजमीं पर हम को ही ग़ुलाम बना के
आन्तरिक औपनिवेशीकरण का शिकार बनाया
हम ने जब विरोध में आवाज उठाई इस भेद भाव के
तो झूठे रास्ट्रबादियों ने हम को ही गद्दार बताया

दंभ और अहंकार के नशे में चूर बौखलाए ये लोग
पलते रहे हैं आजतक हमारी ही रोटीयों को खा के
आज हम को हमारे घर से हटाने की साजिश ऐसी
विदेशी भगोड़ा बोलते हैं हम को ही आँखे दिखा के

हमारे भाषायों को  दबाने का दुस्साहस किये ये लोग
प्रयत्नशील रहे हैं ये हमारी संस्कृति को भी मिटाने में
अबतक सहा हैं हमने बहुत अत्याचार और दुराचार
लेकिन अब न पीछे परेंगे हम अपना कर्त्तव्य निभाने में

अब तयार हैं  हम भी हर इम्तेहान के लिए आज
अगर लड़ाई की भाषा ही सिर्फ  समझोगे तुम
चल पड़े हैं मुक्ति के इस पथ पर , धमाके भी होंगे ,
अगर धमाकों से ही सिर्फ  जागोगे नींद से  तुम





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